स्वयं से, स्वयंवरा बनने का यह सफर आसा न था।

मैं से, जगतजननी  बनने का यह सफर आसा ना था।


मर्यादाओ मे तो बन्धे श्रीराम थे,
पर मर्यादाओ को निभाना भी कहाँ आसान था।
पथ दिखाया है जो प्रभु ने,
चलना उस पर धर्म था।
पुष्प हो या अग्निपथ,
चलना उनको निष्काम था।

दासी जिनकी रानीयो सा जीवन करती थी बसर,
उस तीनो लोको की स्वामीनी को वन में जीवन बिताना कहाँ आसान था।
कष्ट इतने में रूकते कहाँ है,
फिर वन से हरण उनका हो गया।
राजसी वैभव जिसने था छोङा,
उसे मृग का मोह कैसे हो गया?
जो सरल थी नीर सी,
वो बाल हठ क्यो कर गयी?
स्वामीनी बैकुंठ लोक की,
कालचक्र मे क्यो फस गयी?

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राजा राम का श्रीराम बनने का यही संयोग था।
चल पङी सीता हरण हो,
एक पथ प्रदर्शक की तरह।
स्वर्ण लंका थी जिनके लिए अति तुच्छ सी,
ऐसी पतिव्रता को रावण चला था मोहने।
फिर एक जीवन बिताया योगीनी का,
जो बना आर्दश है।

जब नही थी आस कोई,
तब भी संकल्प अडिग पर्वत सा रहा।
सहारा लेकर एक तिनके का,
दशानन का अभिमान भंजन करती रही।
फिर बनी साक्ष्य समय की,
जब रावण जर संग चल पङा।
स्थापना हुई धर्म की,
जिस धरा पर पग उनका था पङा।

आ गयी थी जानकी अब,
अयोध्या के राज्य में।
जल रहे थे दीप हर ओर,
हर्ष और उल्हास में।

त्याग और बलिदान को जैसे यह जीवन था बना,
जल्द आ गया वह दिन भी,
जब अग्निपथ पर चलना पङा।
मर्यादा पुरूषोत्तम तो बन गये श्रीराम थे,
पर मर्यादाओ की आग मे चल रहा कोई और था।
मैं से, जगतजननी बनने का यह सफर,
सच में कहाँ आसान था।

जिन्दगी बस बढ तो रही थी,

बहानो ही बहानो में,

पसीना न बह जाये,

ख्यालो ही ख्यालो में।


दुनिया बदलने ही तो वाली थी,

सपनो के आयने में,

एक छोटी सी ठोकर,

जमी पर हमको ले आयी।


खड़ा था घर के आँगन में,

सामने मेरी परछायी थी,

दिन चढ चुका था,

ख्यालो की बुनायी में।

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इस दिल को समझाना,

कहाँ आसान होता है,

जब भी चुप बैठो,

ये खुद ही जाग जाता है.


आशा है, निराशा है,

ये अरमानो के दो पहलु है,

बनायी जिसने ये दुनिया है,

उसे बस कर्म भाता है।


ना आशा हो कर्म फल की,

न निराशा हो असफलता की,

स्वपन को लक्ष्य में बदलो,

बहानो को कर्म से बदलो।


मिला जो एक अवसर है,

उस अवसर को स्वर्ण में बदलो,

आये हो धरा पर तो,

धरा को स्वर्ग में बदलो।

 क्या शब्द है,

क्या है नम्बर,

हम सबसे अन्जान थे।


क्या है धरती,
क्या है अम्बर,
हम सब तो हैरान थे।

क्या है सर्दी,
क्या है गर्मी,
ऋतु चक्र क्या एक विज्ञान है।

देखा-देखा सा था सब कुछ,
पर इनके नामो से अन्जान थे,
फिर वो आये जीवन मे,
हल लेकर हर जिज्ञासा का।
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शब्द भी सिखे,
अंक भी सिखे,
दिखाया हमको एक संसार नया।

बदलने लगा दायरा सोच का,
फिर समझाया विज्ञान है क्या,
विषय अनेक थे उनके पास,
और समझाया हमको शिक्षा का सार,
पढो अपनी रूचि से सब कुछ,
शिक्षा नही है कोई व्यापार।

पुस्तक की दुनिया हमे दिखायी,
इसमे हमको सैर करायी,
आगे बढने की राह दिखायी।

ऐसे ही हर एक शिक्षक ने,
इस देश की नीव बनायी,
आप सबके उपकार है हम पर,
करते है हम, सत् सत् नमन,
सत् सत् नमन।

हम मौन थे ओर न जाने ये समय कब आगे बढ गया।
कल जो था, न जाने कब युगान्तर बन गया।
दोष किसका था, ये  न जानता था कोई।
पङ गये विरान ये घर, हो गयी कुछ रात सी।
कल सुबह होगी, छोङ दी ये आश भी।
""कुछ नही बिगङा हे अब भी,
कहनी इतनी सी बात थी।""
पर हम सब तो मौन थे, टल गयी ये बात भी।



हो चली फिर देर कुछ यू, खो गये हम खुद मे ही।
आ गयी फिर ॠतु बंसत की, सूखे पत्ते खो गये।
कुछ पूरानी डालीयो पर नये कोपल आ गये,
ओर कुछ पूरानी डालीया फिर न हो सकी हरी।
हम मोन थे, स्तब्ध थे, काल खण्ड बदलता रहा।

खो चुकी थी आन अपनी, पहचान अपनी ये धरा।
खो गया था इतिहास मेरा, जो मन के पन्नो पर था छपा।
गॉव मेरा मौन था,  पित्र मेरे मौन थे।
क्या बदलने को चले थे, क्या बदलकर रख दिया।
मै बङा हूँ या वो बङा, इसमे फस के रह गये।
""कुछ नही बिगङा हे अब भी,
कहनी इतनी सी बात थी।""
पर हम सब तो मौन थे, टल गयी ये बात भी।


देश की वीर मीडिया

सच में बहुत ही जांबाज हे मेरे देश की मीडिया। इसको बिल्कुल भी डर नहीं लगता र्बोडर लाइन पर जा कर कवरेज करने में, ना ही प्राकृतिक आपदा के दिनों में केदारनाथ पहुँचने में। कभी-कभी लगता हे, जैसे देश की आन्तरिक व बाहरी सुरक्षा हमारी मीडिया ही कर रही है, और बाकी सब तो इनके आदेश का इन्तजार कर रहे है।

चाहे देश को 2 सालो में चीन से आगे ले जाने की बात हो या आतंकी देशों को धूल चटाने की, इनके जानकार लोग हर वक्त प्लान के साथ तैयार रहते है। इनके सवालों व समाधानों का तो साहब में कायल हूँ, चाहे करप्शन हो या किसानों की समस्या, बाढ हो या सूखा, बच्चा गढे में गिरा या शराबी नाले में, आपके घर में लालटेन है या शौचालय, ये किसी भी विषय को नहीं छोड़ते, क्योंकि समाधान किसी के पास हे तो वो हे हमारी मीडिया।
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बस कुछ ही चैनल बचे हे, जिसमें दो देशों के बीच बढ रहे तनाव को ब्रेकिंग न्यूज नही माना जाता है, बल्कि एक गंभीर चुनौती समझा जाता है। वो है, देश का नेशनल चैनल व एनडीटीवी जैसे कुछ र्द्रुलभ चैनल। अब प्रश्न ये भी हे कि ब्रेंकिग न्यूज, चाय के साथ लिया जाने वाला बिस्कुट बन गया हे, तो जनता से भी ये बिस्कुट छोड़ा नहीं जाता है। कुछ लोगों से हमने पुछा आपने नेशनल न्यूज चैनल कब देखा था, और महिने में कितने बार देखते हो, हालांकि ये कोई सर्वे नहीं था, पर बहुत से लोगों का जवाब था कि 26 जनवरी व 15 अगस्त को देखा होगा या फिर उनको याद नहीं था। 

चैनलों की स्वामी भक्ति से कोई एतराज नहीं है, उनका चैनल हे कुछ भी दिखाये। परन्तु प्रश्न यह है, एक खबर को 12 घण्टे अलग-2 तरह से चलाने का हुनर किसने सिखाया। कैसे आप वातानुकूलित कमरों में बैठकर सेना, अधिकारियों, किसानों, मजदूरों को हर वक्त ज्ञान बाट सकते हो। क्यों आपके चैनलों पर आपकी इंडस्ट्री में हो रहे भ्रष्टाचार की खबरें नहीं आती? क्यों आप उन रिपोर्टर का नाम नहीं लेते, जो किसी व्यक्ति या विषय पर गलत न्यूज चलाता है? ये सभी प्रश्न आपको अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए खुद से पुछने होगे।

देश की असली समस्याओं पर आपको अपना साहस दिखाना होगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण क्षेत्रों का पलायन, गरीबी ओर न जाने कितनी बातों में आपकी साहसिक भूमिका की जरूरत है। जहाँ आपकी जरूरत हे वहाँ टी.आर.पी. नहीं है, और हमारे बार्डर पर आपकी जरूरत नहीं हे, वहाँ आपकी ब्रेकिंग न्यूज है। मैं उत्तराखण्ड से हूँ, एक सत्य बात बताता हूँ। केदारनाथ आपदा के दौरान बहुत से रिर्पोर्टर देव प्रयाग व श्रीनगर के आस पास जा कर ही दावा कर रहे थे कि हम जान का जोखिम लेकर केदारघाटी से रिर्पोर्टींग कर रहे है, और हम लोग ये देखकर दंग थे।

हमारी इस साहसी मीडिया को मेरा सलाम। सभी से आग्रह हे अपनी पसंद का चैनल जरूर देखे पर आंख बन्द कर के भरोसा ना करें। अपने अधिकारियों, सेना व देशवासियों का सम्मान करें। जरूरी लगे तो सवाल कीजिए, विरोध कीजिए सरकार का, पर जो टी.वी. पर परोसा जा रहा है, उसको आखिरी सत्य ना माने।

अपनी बाते व सुझाव जरूर दीजिए व पोस्ट महत्वपूर्ण लगे तो शेयर करें।

दर्द ही दर्द हे, मेरे देश के सीने में,
इस दर्द से मेरा दिल भी पसीज जाता है।
ये जो बच्चे सो रहे है सड़को पर,
इनको देख विकास की बातों से भरोसा उठ जाता है।

कभी शहादत जवानों की सुनता हूँ,
तो कभी खुदकुशी किसानों की।
जब भी ये बेहाली देखता हूँ,
जय जवान, जय किसान का नारा भूल जाता हूँ।

राह चलती लड़की संग, जब ये दुर्व्यवहार होता है,
तब अपने दिये वोट पर, मैं ही खुद पछताता हूँ।
जब सरकारे घोटाला कर रही होती हे, 
तो आम इनसान को लाचार पाता हूँ।

जब जगमगाती गाड़ीयॉ, गरीबों को रौंद जाती है,
और अदालत में घरवालों को खरी खोटी सुनायी जाती है।
तब विश्वास होता हे, कानून तो अपना अंधा है।

हर बार दिल ऐसे ही दर्द में डूब जाता है,
जब देश का दर्द ऐसे सामने आता है।

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