Mentality of Misusing Right of Freedom

"स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने की मानसिकता"


This essay of mine was published in Chronical Magazine in 2007as First Price Winner, I am sharing here because I believe it has some important points, which we can consider in our day to day life.

हम सभी जानते हे कि कोई भी वस्तु एक सीमा से अधिक प्रयोग में लायी जाये तो उसके नकारात्मक रूपों का उसमें प्रभाव आ ही जाता है। यदि वर्षा के मौसम में नदी पर बाँध न बनाया हो, तो वह अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग ही करती है और हमको उसका परिणाम भी भुगतना पड़ता है। यदपि हम यह बात अच्छी तरह से जानते है कि स्वतंत्रता का अर्थ हमारा मौलिक व सैध्दान्तिक रुप से स्वतंत्रता रहना है, न कि सैध्दान्तिक नियमों का उल्लंघन कर अपने खुद के नियम बनाना। जब तक घोड़े पर लगाम ना डाली जाये, तब तक वह अच्छा धावक घोड़ा नहीं बन सकता है। दौड़ना उसकी स्वतंत्रता है, पर उसकी दौड़ने की दिशा उसकी सीमा है।

यदपि मनुष्य पर इस तरह से कोई लगाम लगायी नहीं जा सकती है, हमें अपने ऊपर खुद कुछ सीमाओं का निर्धारण करना होता है, जो की पूर्ण रुप से नैतिक व व्यवहारिक हो। प्रायः यह पाया गया है, कि व्यक्ति कही न कही इतना बन्धा होता है, कि वह अन्य स्थानों पर मिलने वाली स्वतंत्रता का सही अर्थ नहीं समझ पाता है, अर्थात हम कह सकते हे कि मनोवैज्ञानिक कुठांओ के कारण व्यक्ति स्वतंत्रता का सही अर्थ नहीं समझ पाता है। हर कोई व्यक्ति छोटी गलतियो को स्वीकार नहीं करता, उसका तर्क यह होता है, यह मेरा अधिकार है या फिर गलती एक से नहीं होती। परन्तु हम ये सोचने की चेष्टा नहीं करते कि हम कहाँ गलत थे, और क्या यह सुधार के योग्य है।

जिस प्रकार शेर सबसे शक्तिशाली होने के कारण जंगल में निश्चिंत घूमता है, और किसी भी निर्बल प्राणी को क्षति पहुँचा सकता है, क्योंकि वह इतना स्वतंत्र है, कि उसे लगता है कि मेरे ऊपर कोई नहीं है। उसी प्रकार अधिक संपन्न लोग व बड़े पदों पर आसीन व्यक्ति इसी प्रकार निर्भय होकर कुछ भी कर देते है। चाहे फिर वह किसी की इज्जत का खिलवाड़ हो य़ा जीवन, उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। य़ह निर्भय स्वतंत्रता व्यक्ति में एक व्यग्र मानसिकता को जन्म देती है। ये व्यक्ति कही भी अपना निरादर य़ा अपमान नहीं चाहते और झूठी इज्जत बनाये रखने के लिए कुछ भी कर सकते है। जैसे की आज कल रोज सुनने को मिलता हे कि पत्रकार की हत्या हुई, संदिग्धो में पुलिस व देश के मुखिया आदि। 

  इन कारणों के लिए केवल एक व्यक्ति या समाज दोषी नहीं है। इस मानसिकता का एक कारण हमारे कानून का राजनीतिकरण  भी है, अभिप्राय यह हे कि कई मामलों में कानून व्यवस्था बड़े लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गयी है।  जिस कारण निम्न वर्ग का शोषण हो रहा है और उनकी मानसिकता बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। इसलिये वे जहाँ कही भी स्वतंत्रता पाते है, इस समाज के विरुद्ध  ही कुछ करने का प्रयास करते है। आज के समय में उत्पन्न अलगाववाद का जन्मदाता हमारा वह समाज है, जिसने अपनी स्वतंत्रता के तले  मासूमों की भावनाओं के साथ खेल किया। 

आज स्वतंत्रता के 70वें वर्ष में हमने स्वतंत्रता के मायने बदल दिये है। समाज में कुरीतियों का जन्म हुआ है। स्त्री समाज ने अपनी स्वतंत्रता का गलत प्रयोग अपने चरित्र को बेचकर किया है, वे अपने अंगों का प्रदर्शन इतनी सहजता से करती है कि उनके प्रभाव से स्त्री समाज का एक बड़ा हिस्सा उस राह पर निकल पड़ है। यह एक यक्ष प्रश्न हे, कि एक स्वतंत्र विचारो की महिला किरण बेदी जैसी हो या बोल्ड अभिनेत्रियों की तरह? इस कारण समाज में अनेक जघन्य कृत्यों को प्रोत्साहन मिला है। अपने अधिकारों का प्रयोग करना हर एक महिला वर्ग के उत्थान के लिए आवश्यक है पर चरित्र का दायरा बनाये रखना होगा।
यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा शहरी क्षेत्रों में विकराल है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में माता पिता बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते है और नाहि वे उनकी अच्छी बुरी आदतों  पर ध्यान देते है। सभी लोग अपना जीवन अपने तरीके से बिताने में विश्वास रखते है। कई बार अज्ञानता वश ही सही पर घर से मिली छूट के कारण बच्चा गलत दिशा में भटक जाता है और यदि बच्चा संपन्न परिवार से हो तो समस्या गंभीर हो जाती है, क्योंकि कई बार ये पैसे का दुरुपयोग नशे या जुआ में करना शुरु कर देते है। इस प्रकार से गलती में सुधार लाना काफी कठिन हो जाता है। 

अगर तू चाहता हे जीना खुल कर,
तो भी हाथों को फैलाने का दायरा बनाले।
घुमती तो मछली भी हे नदियों में बहुत ज्यादा,
पर वह भी नदियों को छोड़कर सागर में नहीं जाया करती।
अगर सोचेगा सागर की तरह चाँद को छूने की,
तो हमेशा रेत कंकड़ ही साथ लायेगा,
बहुत जल्द न सही पर फिर भी कभी न कभी नीचे ही गिर जायेगा। 

यह हमारी आदत सी बन गयी है कि हम अपने अधिकारों का प्रयोग अपने से नीचे तबके के लोगों पर करते है। अगर हम चाहे तो धिरे ही सही पर इस परिवेश को बदल सकते है। किसी भी क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए आपमें सहयोग व  विश्वास की भावना होनी चाहिए। इस परिवर्तन का सूत्रधार चाहे तो हमारा शिक्षक समुदाय हो सकता है। बच्चा एक सुकुमार मस्तिष्क को लेकर विद्यालय में प्रवेश लेता है, वहाँ वो जैसा परिवेश पाये कुछ हद तक उसमें वह गुण आ ही जाते है। अतः देश में स्वतंत्रता की जगहा नैतिकता को प्रभावशाली बनाना है, तो यह एक कारगर उपाय साबित हो सकता है। 

इससे जो हमारा अधिकारों के प्रयोग का गलत तरीका है, वह काफी हद तक दूर हो सकता है। आज के दौर में हर किसी को अच्छे व शांतिपूर्ण परिवेश की आवश्यकता है, न कि अपने पैरो तले एक दूसरे को कुचलने की। आज हमारे कारण हमारा घर-आँगन हमारे लिए जेल बनकर रह गया है क्योंकि की हम किसी दूसरे व्यक्ति की बात सुनना नहीं चाहते है और नाहि किसी की कोई बात सहन करना चाहते है। बस शायद स्वतंत्रतापूर्वक घर के अन्दर घुट-घुट कर मरना चाहते है।

List of Articles Published on this blog:
1. Social Identity
2. One Nation, One Election Process
All content is ©copywrite of nextcenturywriter.com

No comments:

Post a Comment