भाई-भतीजावाद (अपनो के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी या जिद्)

पिछले कुछ समय से एक विषय बहुत चर्चा में है, या कह सकते है कि एक शब्द समूह विशेष रूप से आम बातचीत का हिस्सा सा बन गया है।


बिल्कुल आप सही समझ रहे है, मैं आज भाई-भतीजावाद के बारे में ही बात करने जा रहा हूँ। मैं इस विषय के विवादित उदाहरणो पर ना जाकर, इसके मनौवैज्ञानिक पहलूओ पर बात करने जा रहा हूँ। प्रश्न यह है, क्या यह विचार एक सिमित समाज या समूह के लोगो में ही पाया जाता है, या हमारे समाजिक सोच का ही हिस्सा है और इसके सकारात्मक व नकारात्मक दोनो ही पहलू है।


थोड़ा सा पिछे जाकर यदि इतिहास के पन्नो को टटोलते है, तो नजर आता है कि एक राजा का उत्तराधिकारी उसका पुत्र ही हुआ करता था और मुख्य पदो पर आसीन ज्यादातर लोग कुछ परिवारो तक सिमित रहते थे। परन्तु उस दौर में यह समाजिक परम्पराओ का एक हिस्सा था, इस वजह से इसको कभी भाई-भतीजावाद की तरह नही देखा गया। फिर समाजवाद का उदय हुआ और यह प्रश्न भी उठे की, क्या गरिब का बेटा राजा नही बन सकता या फिर योग्यता के आधार पर पदो का निरर्धारण होना चाहिए।सभी के लिए समान अधिकार की बाते भी हुई और समाज ने परिवर्तन का दौर भी देखा।आज सभी के लिए सर्वोच्च पदो पर पहुँचना संभव है।

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फिर से अपनी चर्चा को आधुनिक दौर के परिदृश्य में लेकर आते है, क्या भाई-भतीजावाद हमारा परिवार की जिम्मेदारीयो से निकला हुआ एक भाव है, या फिर हमारी जिद्द कि हमको अपने पारिवारिक सदस्यो को ही सबसे आगे देखना है।


हमारे समाज मे अमोमन यह देखा गया है कि माता-पिता सिर्फ बच्चो बङा करना, शिक्षित बनाना ही अपना कर्त्तव्य नही समझते है' बल्कि अधिकतर माता-पिता को लगता है, जब तक वो सामर्थयवान है तब तक उनको अपने बच्चो के बेहतर भविष्य के लिए कार्यरत रहना है और जब वो इस दुनिया से जाये तो बच्चो के लिए सुख-सुविधा के सभी साधन छोङकर जाये। अब यह जिम्मेदारी कब उनके मोह मे बदल जाती है,  और यह मोह कब जिद्द बन जाये कहना बहुत मुश्किल है।


व्यवसायी अपना व्यवसाय चाहे कितना ही योग्य लोगो की साहयता से ऊचाईयो पर ले जाये, परन्तु व्यवसाय का मलिकाना हक वो हमेशा अपनी आने वाली पीढीयो को ही देता है, इसमें कुछ अपवाद जरूर हो सकते है। इसी तरह डाक्टर, इन्जीनियर, अध्यापक या अन्य प्रभावशाली क्षेत्रो मे काम करने वाले लोग अपने बच्चो को उस क्षेत्र मे आगे बढने के लिए प्रेरित करते है और हर संभव साहयता करते है। यह समाज की एक समान्य सी प्रक्रिया बन गयी है, इसलिए हमको इसमे कुछ भी गलत नही लगता है।


अब कुछ क्षेत्र ऐसे भी है जहाँ आपकी पहचान का प्रभाव इस कदर होता है कि आपकी सफलता की संभावनाएँ आपकी योग्यता के साथ-साथ आपकी प्रभावशाली लोग तक पहुँच भी निर्धारित करती है। जैसे राजनीति, सिनेमा, मिडिया व अन्य सामाजिक क्षेत्रो से जुङे कार्य। जहाँ आपके परिवारो का नाम आपकी सफलता मे बहुत अहम होता है, और नये लोगो को आगे बढना इतना आसान नही होता है।


समस्या भी यह ही है, अपनो की परवाह करना या उनको सफल बनाने में मद्त करने मे कोई बुरायी नही है। परन्तु जब हम अपने प्रभाव से अधिक योग्य लोगो को पिछे करके अपने लोगो को बढावा देना शुरू कर देते है, तो समाज मे इस तरह के भेद-भाव से आक्रोश पैदा होना समान्य सी बात है। जब हम यह ठान लेते है कि अमुख पद पर हमारे अपने ही पहुँचने चाहिए, और इस जिद्द के लिए आप हजारो योग्य लोगो के सपनो को रौंदना शुरू कर देते है तो मेरी समझ में यह भाई-भतीजावाद है।


हमारे समाज में यह कहावत बहुत पुरानी है, "जैसा राजा, वैसी प्रजा"। माना की प्रजातंत्र मे राजा जैसी कोई उपाधि नही है, पर किसी भी क्षेत्र के सर्वोच्च पदो पर आसीन लोगो का चरित्र ही आज के समाज को प्रभावित करता है। अगर इन शीर्ष पदो पर व्यक्ति भाई-भतीजावाद के प्रभाव से पहुचता है तो आप समझ सकता है कि बहुत से योग्य लोग अपनी असफलता की कुंठाओ मे फसे रहेगें, और देश चलाने वाले समाज को अन्धकार की तरफ बढा रहे होंगे।


इस लेख के माध्यम से सभी पाठको से अनुरोध है, आप अपने बच्चो को योग्य जरूर बनाये, परन्तु उनको प्रतियोगिता में स्वयं को सिद्ध करने का अवसर अवश्य दे। इससे हमारे देश को योग्य युवाओ का नेतृत्व हर क्षेत्र में मिलेगा और सामाजिक सौहार्द बना रहेगा।

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