Poem no.2 - मेरा इश्क मुशाफिर की तरह

इश्क के सफर में कुछ दूर हम भी चल पड़े,
राहे और भी तन्हा होने लगी, जब लगा मंजिल की और चले।
ये सफर रख कर लिबास आंखों पर चलने को हे बना,
हम तो अपनी आँखें ही  उनको देकर चले।

दर्द राहो के पत्थर से कम और फूलो से ज्यादा मिलता हे इसमें,
मंजिल बाहे फैलाये कर रही होगी इंतजार मेरा,
इस भ्रम में हम तूफानों से लड़े, और चलते रहे।
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हर राही की एक मंजिल जरूर होती है,
कदम उस और बढे तो सबकी ख्वाहिश मुकम्मल जरूर होती है।
हम तो जमी से समंदर की और चले,
जैसे-जैसे साहिल से दूर गये, डूबना हमारा तय हो चला।

जिंदगी का ये खेल इतने में ना थमा,
एक चाँद को चूमती लहर ने  जमी पर दे पटका।
आँखें खुल ना जाये इस बात से डरता हूँ,
आज भी बन्द आँखों से उसे ढूँढता हूँ।

ऱाहे वीरान की वीरान रह गयी,
मंजिल तो वही थी, पर उसको पाने की जुस्तजू दिल में ही रह गयी। 

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