न जाने क्या लिखने को जी चाहता है,
पर कोरे कागजों को भावों से भरने का जी चाहता है।
न जाने कितने दिन गुजरे हैं ये सोचने में,
आखिर मेरा दिल क्या चाहता है?
मन का शून्य में होना भी एक भाव है,
इस जज्बात को जताना चाहता हूँ।
इन कोरे पन्नों को न जाने कब से देखता जा  रहा हूँ,
हर बीते लम्हे के संग इनसे और भी ज्यादा जुड़ता जा रहा हूँ। 
जिंदगी जब इस मोड़ पर आ खड़ी हो,
जब कुछ न सोचना एक सोच बन गई हो।
तो उस वक्त खुद से एक बात कर लो,
क्या हमको खुद की समझ हो चली है?
या सलीका आज में जीने का आ गया है।

क्या होता जो ये जिंदगी का आखिरी दिन होता,
ये आने वाला कल बस बातों में रह जाता,
जो आदत पड़ी है मुझको छोड़ने की कल पर,
क्या आज भी इस दिन को कल पर छोड़ जाता।

बिन वक्त गवाये मैं कुछ काम में जुट जाता,
यादों में रहते है जो दोस्त मेरे, उनसे मैं कुछ बातें कर लेता।
झट से करता एक मैसज टाईप, और थैंक्यू मैं सबसे कहता।
याद करता उन सबको, जिनको किया परेशान कभी,
उन सबको दिल से सॉरी मैं कहता।

सोने को गोद तलाशता मैं माँ की,
लड़-झगड़ने को भाई-बहिन को बुला लेता,
बच्चों को सिर्फ प्यार ही देता,
और जीवन-साथी को कहता,
बैठो दो घड़ी तुमको निहार लूँ,
बाते बस उस पल दिल की होती,
रिश्ते पर उम्र का पहरा ना होता।

मैं हर वो कोशिश करता, 
जो मैंने छोड़ दी था कल पर,
मैं हर वो काम मुकम्मल करता,
जिसका मुझमें हुनर होता।

शायद मैं भूल जाता मजहब को,
दिल में कोई बैर न होता,
सब में मुझको अच्छा ही दिखता,
सब कुछ मुझको मुमकिन लगता।

शायद हम सब कुछ ऐसा ही करते,
जो ये हमारा आखिरी दिन होता,
ये दिन गुजरेगा और एक नया वर्ष शुरू हो जायेगा,
कब तक कल पर छोड़े जीवन को,
अब बस आज को ही बेहतर जीया जायेगा। 
                                           "" Very Happy New Year to All of You ""


Live everyday like its your last, follow your dreams, forget your problems, never hold back, you never know what's around the corner.

Poem in Garhwali ( गढवाली बोली में कविता)- प्रीत की मार


कदगी तेज भागी मी यन ऊँचा-नीचा बाटों बै,
फाल मारी मिल हमारा ऊँचा बाड़ा बे,
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

अब यन न देख तू म्यारा फाटया सुलार ते,
हक-बक मा फसी छो मी कुँजी का बीच मा,
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

यन नजर से ना देख मैते,
माना आज नी दिखणू छो मी मनखी जन,
रात ज्यादा लगेली छे मीलयो मिन,
और भीड़गी छो 2-4 नौनो संग।
पर ते मिलड़ आयूँ ची मी,ये बन्द नीली आँखी मा।

मी नी छो तेरो बाबू को हल्या,
फिर किले बिठायूँ मैंते ये डीप धार मा।
संग बैठ, कुछ गप लड़ो ये बीचली धार मा।
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

यती उधभरी भी कभी न छो मी,
पर न जाड़ी ग्रहो की क्या कुचाल चली,
सिदा बाटा औणू छौ मी, न जाड़ी कनके ढसाक लगी।

माना की कुछ दोष यन धूपी चश्मों को भी छो,
जूँ रुमकी बगत भी लगयाँ छा,
पर पिछली शनिवार किले बोली तेन, य्ँ में पा जचणा छा।
अब ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी, ये टूटया चश्मा ते खिशा मा लगेके।

हाकी बार औंण से पैली मिल दिन दिखोण,
आज त मी फँसी रम की बास मा, हाकी बार मिल वोडका लगोंण।
जरा ता भाव दे छोरी, आयूँची ये दूर धार मा,
जु नी होंण छो मी दगड़ी, सब कुछ ह्वेगी ये बार मा।

ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...
छवाड़ के ये नखरा अपड़ा जरा प्रीत दिखे दे।


इस Blog की सभी कविताएँ स्वरचित है, यदि आप कोई भी हिन्दी या गढवाली कविता का उपयोग करना चाहते हैं तो हमारी अनुमती अवश्यक है। इस Garhwali रचना को पढने के लिए धन्यवाद।  Garhwali, Uttarakhand में बोली जाने बाली एक बोली है, जोकी हिन्दी की तरहा ही लिखि व पढी जाती है।

Poem No.17 - सबसे पहले क्या चाहिए?

मुझे अलग-अलग राजनीतिक विचार धाराओ से मुक्त भारत नहीं चाहिए,
मुझे हर अच्छी राजनीतिक पार्टी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे दो वक्त की रोटी और पक्का घर चाहिए।

मुझे मैक इन इंडिया और एफ.डी.आई. भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे सरकारी स्कूल में अच्छी शिक्षा चाहिए। 

मुझे साइनिंग इंडिया और डिजिटल इंडिया भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे शिक्षा की काला बाजारी  बंध चाहिए।

मुझे मंदिर और मस्जिद दोनों चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे अपने बच्चों का बेहतर भविष्य चाहिए।

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मुझे अपनी बिटिया मिस. वर्ड और साइन्सटिस्ट भी चाहिए,
पर इन सब के संग मुझे हर एक लड़की की सुरक्षा चाहिए।

मुझे एम्स और आई.आई.टी. भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे जिला अस्पताल में डॉक्टर, दवा और टेस्ट चाहिए।

मुझे स्वच्छ भारत और बुलेट ट्रेन भी चाहिए,
पर इन संग मुझे गाँवों तक रोडवेज बस भी चाहिए।

मुझे कश्मीर से लेकर डोकलाम चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे खाली पड़े गाँवों में 2-4 लोग चाहिए।

ये सब तो शायद मुझे चाहिए, आप भी सोच लो आपको पहले क्या चाहिए।
मुझे तो मेरा परिवार खुश चाहिए, ना कोई मजहब की बंदिश ना कोई गुटबाजी चाहिए। 

हमारे childhood(बचपन) की न जाने कितनी यादें होती हैं, जिनको हम हिन्दी की कविताओं में  सहेजना चाहते हैं, इसी श्रृंखला में ये  बचपन की हसीन यादों पर लिखी यह कविता आपको जरूर पसंद आयेगी।

हिन्दी कविता - बचपन की हसीन यादें

वो दिन कितने हसीन थे,
जब दिन खेलने को छोटे होते थे,
और रातें पढ़ने  को लम्बी लगती थी।

वो दिन सच में बहुत हसीन थे,
जब क्लास लम्बी लगती थी,
और इंटरवेल छोटे पड़ जाते थे।

हम कितने खुश थे तब,
जब पन्नी में बंधा टिफिन होता था
और बैग अपना फटा होता था।

हम सच में कभी बहुत खुश थे,
टेंन्शन का तो पता ना था,
पर होमवर्क पहाड़ सा लगता था।

वो हँसी कितनी सच्ची थी,
दोस्तों से ही लड़ते थे,
फिर संग ही ठहाके लगते थे।

वो भी क्या मस्ती होती थी,
बारिश में बिन छाते के जाते थे,
फिर देख भीगी किताबें अपनी, खुद ही खुश होते थे।
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बस एक ही तो था, जिससे हम सब डरते थे,
पर वो सर क्लास के बाद सबसे अच्छे लगते थे,
संग उनके मस्ती होती थी, और डंडे भी खाया करते थे।

एक दोस्त सयाना होता था,
जिसकी हर बातें सच्ची लगती थी,
जब भी कोई मसला होता,
ज्ञान वही तो देता था।

सच में वो दिन कितने अच्छे थे,
क्लास  में वो भी तो संग में पढ़ती थी,
बातों में वो मेरी-तेरी होती थी,
पर संग सहज ही रहते थे।

वो दिन मुझको याद आते हैं,
जब हमको जल्दी अठरा का होना था,
हमको भी कॉलेज जाना था,

सच में वो दिन कितने अच्छे थे,
जिसको हम बचपन कहते है, 
और अब इसकी यादों में खोये रहते हैं।

Poem Childhood Memories - बचपन की यादें

वो सूरज का उगना
पहाड़ी में छिपना।
जब खेलते थे,
न दिन देखते थे,
न धूप-छांव देखते थे।
वो गुल्ली और डंडा,
मिट्टी में सनना,
ताने भी सुनते,
फिर भी ना सुधरते।
याद आती है हमको,
बचपन की हर एक कहानी।

तालाबों में जाते थे मछली पकडने, 
मेंढक के बच्चों को छोटी मछली समझते।
हाथ आती थी मिट्टी,
फिर भी खुश आते थे घर को।
सुबह सजते संवरते,
तेल बालों को करते,
घर से हमेशा स्कूल जल्दी निकलते,
फिर यारों से मिलते, ठहाके लगाते।
याद आती है हमको,
बचपन की हर एक कहानी।

जब अब सोचते हैं,
यही सोचते हैं,
काश लौट जायें वहीं हम,
जहाँ यादों में हम हैं रहते।

Hindi Poem on Childhood Memories के इस काव्य संग्रह में एक नयी कविता जोड़ रहे है। इसी काव्य संग्रह की पहली हिन्दी कविता को आपने काफी प्यार दिया वा Social Media पर शेयर भी किया। हमें पूरा भरोशा है इन पंक्तियों को भी आप वैसा ही स्नेह देगें। 

बचपन पर हिन्दी कवाताएँ यहाँ से पढें। List of Hindi Poem on Childhood




Hindi Poetry(हिन्दी कविता) on Social Issue - ये क्या बात है?


अगर हम जंगल में होते और जंगली होते तो कुछ और बात थी,
पर हम शहर में जंगली जानवर से निकले, तो ये क्या बात है?
अगर घर से बाहर निकली लड़की दुनिया की आखिरी लड़की होती तो कुछ और बात थी,
पर जो हम गिद्ध की नजरों से हर राह चलती लड़की को देखे, तो ये क्या बात है?

अगर धरती की कोर में हो और सुलगते हुए लावा हो तो कुछ और बात है,
पर जो हम देख अपने दोस्तों की खुशी बन फटे ज्वालामुखी, तो ये क्या बात है?
जो दुनिया की हर खुशी और गम का मर्ज नशा होता तो कुछ और बात थी, 
पर खुशहाल घर को तबाह और गम में बरबाद होने को नशा किया, तो ये क्या बात है?
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गरीब से काम लेकर उसको काबिल जिंदगी जीने के बनाया तो कुछ और बात थी, 
पर जो हमने गरीबो का निवाले छिन के महल बनाया, तो ये क्या बात है?
जिनसे सीखे हो चलना और जिंदगी की राहो में आगे बढना, उनको बुढ़ापे में प्यार दिया तो कुछ और बात है,
पर हमने उनके अहसानों को भूल कर उनको दर-ब-दर भटकाया, तो ये क्या बात है?
शानौ-शौकत कमायी संग परिवार के तो कुछ और बात है,
पर जो घर को वीराना बना कर पैसा कमाया, तो ये क्या बात है? 

कुछ और बात थी ... या....ये क्या बात है?
इन दोनों के बीच छिपी खुशियों की सौगात है,
जो समझे इसे तो कुछ और बात है, 
जो नासमझ है, तो क्या बात है?