अधर्म चाहे बलवान हो,

या धनवान,

या रावण जैसा सामर्थवान,


हर युग में आता है कोई राम सा,

सरलता जिसकी हो पहचान,

न किसी बात का हो अभिमान,

मर्यादाओं का हो जिनको ज्ञान।

Dusserha Greeting, Happy VijayaDashmi

हर युग में संग ही चलते हैं,

कभी धर्म प्रबल तो,

कभी अधर्म प्रबल।


अधर्म बलशाली जब हो जाता है,

तब हर युग में आ जाते हैं कोई बनकर राम,

कर देता है अन्त अधर्म का,

और बन जाता है वहाँ भगवान।


सभी पाठकों को दशहरा (विजयादशमी) की शुभकाभनाएँ।

देवताओ की भूमि कही जाने वाला उत्तर भारत का हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड, एक ओर गंगा, यमुना सरस्वती का उद्गम स्थान है, दूसरी ओर अपनी अति प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। उत्तराखण्ड के पारम्परिक त्यौहारो में आस्था की झलक आपको स्पष्ट रूप से दिख सकती है। ज्यादातर पर्व में अलग-अलग तरह से देवी-देवताओं का पूजन भी किया जाता है और खुशियाँ भी मनायी जाती है।

हमने उत्तराखण्ड के मुख्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों को साल की शुरुवात से लेकर अन्त तक श्रेणी बध्द किया है। हम जनवरी से शुरुवात कर के साल के अन्त तक आने वाले सभी पर्वों को आसान भाषा में आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे। फिर कुछ बङे सांस्कृतिक कार्यक्रम के बारे में हम आपको बतायेंगे जो अलग-अलग समय अंन्तराल में बहुत बङे स्तर पर मनाये जाते हैं। 

वैसे तो हमारे देश के सभी बङे त्यौहार यहाँ पर धूम-धाम से मनाये जाते हैं, परन्तु आज हम सिर्फ उन पर्वों की बात करेंगे जो या तो सिर्फ उत्तराखण्ड में मनाये जाते हैं या फिर जो बङे त्यौहार यहाँ पर लोकल परम्पराऔं के समावेश के साथ मनाये जाते हैं। 

शुरू करते हे माघ महीने( जनवरी अन्त ) में आने वाले पर्व बसंत पंचमी से।

बसंत पंचमी : 

उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों मे सरस्वती के लिए विख्यात इस पर्व का उत्तराखण्ड में अलग ही सांस्कृतिक महत्व है। विधिवत् तौर तरीकों से सरस्वती पूजा व बसंत आगमन का स्वागत तो किया ही जाता है, साथ ही साथ आज के दिन ही बच्चों को पहली बार पढाने लिखाने की परम्परा वर्षो पुरानी है। पाटी के ऊपर कुछ पौराणिक मंन्त्र लिखकर इसकी शुरुवात की जाती है। साथ ही आज के ही दिन बच्चे जो तीन वर्ष के हो चुके हैं उनका चूङाक्रम संस्कार (मुन्डन) किया जाता है, ओर इसके बाद उनकी शिक्षा आरंम्भ कर दी जाती है। आज ही के दिन बालिकाओं के पहली बार कान नाक छिदवाने की परंपरा है। ये कुछ विशेष बातें थी इस कार्यक्रम की जो आपको सिर्फ उत्तराखण्ड में ही देखने को मिलेगी।

Uttarakhand Basant Punchami, Uttarakhand Tradition


फूल देही(फूल फूल माई):

चैत्र महीने (मार्च मध्य में) की सक्रान्ति को मनाया जाने वाला ये लोक पर्व अपने आप मे बहुत ही आनोखा व आनन्दायक है। इस वक्त पहाङों में बुरांस, फ्यूली व अनेको प्रजाति के फूल अपनी सुन्दरता बिखेर रहे होते हैं। यह त्यौहार एक तरह से हिन्दू नव वर्ष के स्वागत का भी प्रतिक है, और सर्दियों के जाने के बाद सामान्य मानवी के उल्लास का दिन भी है। बच्चे सुबह उठकर सबसे पहले जंगलो में, खेतो में, टोकरी लेकर फूल बीनने जाते हैं, फिर सभी एक साथ जाकर गाँव के हर एक घर पर फूलो की वर्षा करते हुए कुछ लोक गीतों को गाते है, बदले में हर घर से उपहार स्वरूप कुछ ना कुछ दिया जाता है। पहले समय में जितने भाई-बहिन होते थे उतनी मुठ्ठी चावल देने की प्रथा रही है। इस तरह ये नन्हे बच्चे हर तरफ फूलों की खुशबू के संग खुशीयाँ भी बांट आते हैं। तो कैसा लगा आपको फूल देही का यह पर्व?


Phole Dehi Festival, Uttarakhand Tradition


होली :

फाल्गुन के महीने (मार्च में) बसंत ऋतु में मनाया जाने वाले यह पर्व वैसे तो पूरे भारत मे मनाया जाता है, परन्तु उत्तराखण्ड में होली का पर्व आज भी अपनी पुरानी परम्पराओं के अनुसार ही मनाया जाता है। यहाँ होली सात दिन पहले से शुरु होकर होलिका दहन तक चलती है। पहले दिन गाँव के लोग झंडी काटने जाते हैं ( झडे के लिए लम्बी लकङी), जोकी मैलू नाम के पेङ की होती है। झंङी आने के बाद उस कपङे का ध्वज लगाकर पूजा की जाती है। इसके बाद दूसरे दिन से बच्चों की टोली पूरे 6दिन उस झंङो को लेकर आस पास के गाँवों में होली खेलने जाती है, इसमें परम्परागत वाध्य यंत्र ढोल-दमाओ की थाप पर होली के लोक गीत गाते हुए बच्चे भ्रमण करते हैं। इस तरह से सभी गाँवों की होली एक के बाद एक गाँव में आती रहती है, और होली का अद्भुत माहौल रहता है। होलिका दहन के दिन उसी झंडी का दहन किया जाता है व अगले दिन उस राख का तिलक लगा कर होली खेली जाती है। शायद आपमें से बहुत लोगों को यह जानकारी पहली बार मिली होगी, और रोचक भी लगी हो।


बैसाखी (बिखोती के मेले) :

बैसाख महिने (अप्रैल मध्य में) बैसाखी का त्यौहार वैसे तो पंजाब में बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है, पर इस दिन का पुराने समय में उत्तराखंण्ड मे एक विषेश महत्व था। कुछ परम्परा अभी भी जीवित है व कुछ नें नया रूप ले लिया है। जैसा की हम जानते है गंगा नदी पहाङों से निकलने वाली अनेकों पवित्र नदियों के मिलने से बनी है। जिसमें दो मुख्य नदि अलकनन्दा व भागीरथी है, परन्तु पहाङों में सभी सहायक नदियों को बहुत पवित्र माना गया है, और बैसाखी के दिन गंगा स्नान का बहुत महत्तव माना जाता है। साथ ही पहले समय में जब बाजारों व सङको आभाव था, तब आज के दिन बङे मेलों का आयोजन होता था, जहाँ हर आवश्यक सामान का क्रय- विक्रय होता था। बहुत सी ऐसी वस्तुएं होती जो आज के दिन लेकर पूरे वर्ष के लिए रख दी जाती थी। खेत जोतने का सामान हो, भौटिया जनजाति द्वारा बनाये गये टोकरी व कंडे या उनके द्वारा लाये गये र्दुलभ मसाले, ये सब आज के दिन ही मिल पाता था। गंगं स्नान तो आज भी पहले की तरह ही होता है, परन्तु मेलों ने अपना रूप बदल लिया है।


हरेला :

श्रावण मास की संक्रांति के दिन उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल में हरेला पर्व मनाया जाता है। वैसे तो हरेला साल में तीन बार( चैत्र नवरात्रि, शरद नवरात्रि व श्रावण) मनाया जाता है, परन्तु श्रावण महीने में मनाये जाने वाले पर्व का ज्यादा महत्व है। यह भी मान्यता है कि शिव व पार्वती के विवाह इस समय पर हुआ था। श्रावण संक्रांति से 10 दिन पहले पवित्र मिट्टी में घर मे हरियाली के लिये जौ, गेहूँ व अन्य अनाजों के बीज बोये जाते है, जिनको रोज सुबह व शाम की पूजा करके सींचा जाता है। नवे दिन इसकी निरायी करके 10वे दिन त्यौहार मनाने के लिए निकाल लेते है। यह पर्व  हरियाली व सौह्रार्द का त्यौहार है, जहाँ लोग मिल कर प्रकृति का धन्यवाद करते हैं। आज यह कार्यक्रम इतना प्रचलित हो गया कि पूरे राज्य में मनाया जाता है, और पूरे सावन के महीने वृक्षारोपण किया जाता है। हमारी संस्कृति में पुराने समय से ही प्रकृति के लिए विशेष स्थान रहा है। हरियाली की बालियों को पहले घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाता और फिर सभी के सिर पर आर्शीवाद स्वरूप रखा जाता है। यह खुशहाली व सुख का प्रतीक है।

Harela Festival, Uttarakhand Harela


नन्दा अष्टमी (पाती)

भाद्रपद महीने (सितम्बर माह) की अष्टमी के दिन उत्तराखण्ड के गढवाल मंडल में नन्दा अष्टमी ( जिसको पाती पर्व भी कहाँ जाता है) मनाया जाता है। यह मान्यता है कि गढवाल के चाँदपुर व श्रीगुरु पट्टी माँ नन्दा देवी का मायका है, इसके बारे में हम आगे विस्तार में बात करेगें जब नन्दा देवी राजजात के बारे में आपको बतायेंगे। नन्दा देवी कि पूजा स्वरूप यह पर्व हर वर्ष मनाया जाता है, इस समय फसलें पकने वाले होती है, उन सभी फसलों से देवी का प्रतिकात्मक स्वरूप बनाया जाता है और देवी मानव स्वरूप में अवतरित हो कर सभी को अपना आर्शीवाद देती है। शायद यह बातें कुछ पाठकों के लिए नयी हो सकती है, परन्तु यह पुराने समय से चली आ रही परम्पराओं का हिस्सा है। फोक वाध्य यंत्रो ढोल, दमाओ, भंकोर के स्वर पर सभी देवताओं की पूजा की जाती है व मायके आयी सभी बेटियों का विशेष सम्मान किया जाता है। 


दीपावली ( बग्वाल):

दीपावली को उत्तराखंण्ड मैं बग्वाल या बग्वाली भी कहाँ जाता है, दीवाली मनाने का यहाँ अपना अलग ही अंदाज है, आयिए जानते हैं, कार्तिक महीने की चर्तुदशी को छोटी दीवाली व अमावश्या को पूरे देश में दीपमाला मनायी जाती है, परन्तु दीपमाला के 11 दिन बाद एक ओर दीवाली मनायी जाती है जिसको भीरी बग्वाल या काण्सी बग्वाल कहते हैं। दीवाली की सुबह की शुरुवात यहाँ अपने जानवरों की पूजा करके होती है, अपनी गौशालाओं में जाकर सभी अपने पशुओं को टीका लगाकल धूप या अगरबत्ती  करते हैं और अपने हाथों से चारा खिलाते है, इसके बाद दीवाली पर अपने मायके आयी सभी लङकियों को दीवाली का क्लयो ( मिष्ठान) घर- घर जा कर दिया जाता है, जोकि घर पर ही बनाया जाता है। शहरों की तरह गाँव में सिर्फ पटाखे फोडकर दीवाली नहीं मनायी जाती है, रात में सभी लोग एक जगह पर इकठ्ठा होकर भैला(पारम्परिक कार्यक्रम) खेलते है। इस दौरान किया जाने वाला गेंदा नृत्य, ढोल दमाऊ पर फोक नृत्य बहुत ही आनन्दमय होता है, जोकि देर रात्रि तक चलता है। इसके बाद मार्गशीश एकादशी के दिन जो दीवाली मनायी जाती है, वह भीरी बग्वाल या काण्सी बग्वाल के नाम से यहाँ पर जाना जाता है। इस दिन सभी पशुओं की विशेष पूजा करके छोटे बछङो की पूछ पर राखी भी बान्धी जाती है, जो हमारे पशुओं के प्रति प्यार  को दर्शाता है। आपको अगर इस दीवाली को देखना है तो आप जरूर उत्तराखण्ड के किसी भी गाँव में दीवाली के अवसर पर जा सकते है। 

उत्तराखंण्ड में होने वाले मुख्य कार्यक्रम

नन्दा देवी राजजातः

नन्दा देवी राजजात हर 12 वर्षों में उत्तराखण्ड के गढवाल मंडल मे आयोजित होने वाली विश्व की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा है। यह पूरी यात्रा लगभग 20 पङाओं से, 20 दिन में सम्पन्न होती है, जिसमें लगभग 270 से 280 किलोमीटर पैदल चलना होता है। 

पौराणिक मान्यता यह है कि गढवाल के चाँदपुर व श्रीगुरु पट्टी माँ भगवती नन्दा का मायका है व बधांण क्षेत्र ससुराल है। एक बार किसी कारणवश माता को 12 सालों के लिये अपने मायके रुकना पङ गया था, और उसके बाद जब देवी नन्दा को उनके ससुराल विदा किया गया तो समस्त लोग भावुक हो गये। उसी परम्परा को मानते हुए आज भी हर 12 वर्ष में विधि विधान के साथ पूजा करके विदा किया जाता है। राजजात नौटी गाँव से शुरू हो कर, आखरी पङाव होमकुंड पर संपन्न होती है। उसी समय करुड व कुमाऊँ की राजजात का मिलन यात्रा के मध्य में होता, जहाँ से आगे की यात्रा एक साथ संपन्न होती है। यह इतना भव्य व अलौकिक आयोजन है, जिसकी जानकारी के लिए हम अलग से एक लेख जल्द ही पोस्ट करेंगे, जिसमें हम हर एक छोटी जानकारी आपसे साझा करेंगें।

राजजात जैसे आगे पङाओं मे बढती है इसमें अलग अलग गाँवों की छंतोली जुङती जाती है, अंत तक साथ मे चलती है। हर 12 वर्ष बाद एक चार सींग वाले भेङ(चौसिंग्या खाडू) का जन्म होता है, जो इस पूरी यात्रा में सबसे आगे चलता है, और यह माना जाता हे कि आखरी पूजा करने के बाद कैलाश तक की यात्रा चौसिंग्या खाङू स्वयं ही करता है। इस प्रकार नन्दप्रयाग घाट से होते हुए सभी यात्री वापस आ जाते है और यह विशाल पूजा नौटी गाँव में सम्पन्न हो जाती है।

Nanda Devi Rajjaat, Uttarakhand Culture and  Program



पाडंव नृत्य :

पाडंव नृत्य उत्तराखंण्ड के प्राचीनतम लोक नृत्यों में से एक है, जिसका आयोजन मुख्यतः सर्दियों के समय में अलग- अलग क्षेत्रों में होता रहता है। पांडव नृत्य महाभारत की कथा में धर्म की रक्षा करने वाले पांडवों पर आधारित है, जिसमें सभी पात्र जिनको देव रूप माना जाता है अपने पार्श्वओं पर ढोल दमों की विशेष थाप पर अवतरित होते हैं। आस पास के गाँवों के सभी लोग इस नृत्य को देखने के लिए उपस्थित होते हैं, जिसमे हमें इन सभी पात्रों के दर्शन भी प्राप्त होते हैं, और महाभारत अनेको अध्यायों का नृत्य रूप में अवलोकन भी होता है। आखिरी दिन खीर का भोग लगा कर सभी पांडव अपने अस्त्र फिर से उसी स्थान पर रख देते है, और यह पूजा संम्पन्न हो जाती है।

Pandav Nritya, Uttarakhand Foke Dance

हमें उम्मीद है उत्तराखंण्ड के इस त्यौहारों व देवीय कार्यक्रमो की जानकारी ने आपको रोमांचित किया होगा। आप हमारे ब्लाॅग को फोलो कर सकते हैं, ताकि समय समय पर आपको ऐसी जानकारी मिलती रहै। अपने कमेन्ट से हमें जरूर बतायें कि आपको यह पोस्ट कैसा लगा।









हमारा देश त्यौहारो का देश कहलाता है। जिसकी एक बङी वजह हैं हमारे यहाँ विविध संस्कृतियो का ऐसा समावेश है कि एक के बाद एक पर्व आते ही रहते है। नवरात्रि की शुरुवात से तो समझो हर सप्ताह अलग अलग क्षत्रो में अपनी मान्यता के हिस्साब से हम पर्व मनाते है और सरकारी अवकास भी मिलता है। 2020 में दशहरे के बाद आने वाले सभी त्यौहार इस प्रकार है

Diwali Dussera Images

अक्टूबर माह के मुख्य पर्व

* 25 रविवार, दशहरा (शरद नवरात्रि का समापन)

* 26 सोमवार, दुर्गा विर्सजन 


नवम्बर माह के मुख्य पर्व

* 4 बुधवार, करवा चौथ

* 13 शुक्रवार, धनतेरश

* 14 शनिवार, दिवाली/दिपमाला

*15 रविवार, गोवर्धन पूजा

* 16 सोमवार, भाई दूज

* 20 शुक्रवार, छट पूजा

* 24 मंगलवार, गुरु तेग बहादुर जयंती

* 30 सोमवार, गुरु पूर्णिमा ( गुरू नानक जयंती)


दिसम्बर माह के मुख्य पर्व

*25 दिसम्बर, क्रिसमस डे


 हे नारी,

          तुम नौ दुर्गा हो।

तुम नौ रूपों की स्वामीनी हो।

आदि शक्ति हो,

                    अष्ट शक्ति हो।

इस दुनिया की संचालक हो।

Navratri Image, Poem on Navratri, Hindi Poem

क्यों सोचती हो कुछ मुश्किल है,

                     क्यो सोचती हो ये ना कर पाओगी।

किस बात से तुम यूं डरती हो,

                      क्यो कुंठाओ में फस बैठी हो।


तुम कर्म योगीनी,

                      सहनशील हो,

तुम हर संकट का हल कर सकती हो।

                       धैर्य तुम्हारा बङा शस्त्र है,

हर मुश्किल से तुम लङ सकती हो।


करुणा का तुम सागर हो,

                        हर दिल मे घर कर जाती हो।

जब होती तुम क्रोधित हो,

                        हर पापी में डर से कम्पन्न होती है।


विश्वास करो खुद की शक्ति पर,

                        हर शक्ति कि स्रौत हो तुम।

तुम अबला कैसे हो सकती हो,

                       जब सबको तुमनें ही संभाला है।


विश्वास करो, हर रूप में तुम,

                        इस दुनिया को चलाती हो।

माता, बेटी या हो पत्नी,

                        हर रूप मे तुम माँ दुर्गा का रूप कहलाती हो।


ये श्रृष्टी है तुम से,

                       प्राणदायनी ऊर्जा तुमसे,

हर जगह वास तुम्हारा मंगलकारी है।

                       करते हैं हम नमन तुम्हे,

तुम हर रूप मे हम सबकी पालनहारी हो।



इन पहाङी वादियो में धूल सी क्यों छा गयी,

यह विकास की आंधी कैसी आयी है।

दरक रहे हैं न जाने कितने हिस्से मेरे पहाङ के,

ये टूटते पत्थर, फिसलती मिट्टी, न जाने कब कहर बन जायेगी।


प्रकृति को प्रकृति ही जुदा करने की

किसने यह तरकीब बनायी है।

सङकों के माया जाल में,

हम बन बैठे अनजान हैं।


ये कल-कल करती नदियाँ, 

हर पल गिरते झरने,

और पुराने बजारो की रौनक,

कहीं गुम होते जा रहे हैं।

Hindi Poem On Nature, Best Poem in Hindi, Poem Image

वो सूरज का ढलना, पहाङो में छिपना,

धूल की चादर में सिमटता जा रहा है।

चिङियों का चहकना, नदियों का कल-कल,

मशीनी आवाजों से दबता जा रहा है।


फिर आती है वर्षा, करती है तांडव,

मंजर तबाही का हमको है दिखाती।

रुलाता है हमको हर छोटा नुकसान अपना,

पर पेङों का कटना, बेघर जानवरों का होना,

क्यों नहीं हमको हे रुलाता।


जिन्दगी जीने का मायना बदला है हमने,

हर जगह मोल- भाव करते हैं यूँ ही।

विकास की आँधी चली कुछ इस कदर है,

भूल जाते हैं हम, हमको इसी प्रकृति ने है बनाया।


संजोयेंगे हम तो, प्यार करती रहेगी,

बिखेरेंगे हम तो, सन्तुलन वो खुद है बनाती।

इंतजार क्यों उस दिन का है करना,

जब बनना पड जाये मूकदर्शक हमको।

सिमट रहा मॉ के आचल में,

कुछ डरा सा इस जन्नत का लाडला।

डर मौत से किसको यहाँ,

डरते है इस बात से, कल होगा क्या यहाँ।

Hindi Poem, Poem on Kashmir, Dul Lake, Poem Image

कौन अपना है और कौन पराया,

समझ मैं कैसे बनाऊ।

क्या सच है, क्या झूठ,

ये कैसे खुद को समझाऊ।


बिक रहा है, डर बाजार में क्यो,

कौन कर रहा हे व्यापार इसका।

मेरा मजहब, मेरा देश या मेरा जमीर,

क्या मेरी असली पहचान है।


खो गया है एक धूल में,

खर्च हो रहा है फिजूल में।

एक साया काला आ गया,

आतंक हर घर में छा गया।

बचपन जैसे खो गया,

बुढापा बन गया अभिशाप है।


कौन आया वादियों में,

लेकर यह हथियार है।

बह रहा है खून मेरा,

इस तरफ हो या उस तरफ।


छिन गयी पहचान मेरी,

बन रही शमशान हूँ।

छा गया ये काला साया,

मैं अब भी हैरान हूँ।


आये कोई बनके ज्वाला,

चीर दे अन्धकार को।

लग गया जो आतंकी साया,

उसको दो हिस्सो में बाट दे।


आने लगे फिर रोशनी

प्यार और विश्वास की।

देख लू इन वादियो को फिर से,

जैसा देखा था कभी।


मेरा गौ का डांडी काठ्र्यों को हयू गोयी गे,
हवा जु लगङी छे पेली अती सुर-सुरी,
वू भी व्हेगी छे जरा अब गुन-गुनी।

ऐगी छे पंचमी बसंत की,
हर तरफ सारयो मा फ्यूली खिली गेनी।
मी बी हरची गी मेरा बालापन मा,
याद ऐगी फूल वू, जु छो अति पसंद मीतें
Garhwali Kavita, Poem in Garhwali, Poem Image

द्वी डायी छे घोर मू चोक का ओर पोर,
लगदा छां जे पर अति सवादी फल।
जने ह्यून लगनु छो,
डाली मुरझे जानी।
जने यू बसंत आयी,
तने फिर खिल जानी।

कोपल आयी,  हर तरफ हरियाली छायी,
फिर दिखण बैठीगे यू स्वाणी कलियाँ ।
यू फूल छो मेंतें सबसे प्यारो,
हिवांयी जन रंग च,
कानों की बाली जन दिखण मा,
खुशबु वेगी अति भली,
सुन्दरता भरमान्दी छे।

वू छे डायी ओरू की,
जू लदी गे छव्टा छव्टा फूलों से।
अगाज छो यू बसंत को,
कती स्वांणा फूल खिली ग्येना।

यू फूल छो मेंतें सबसे प्यारो,
जू मेंतें बालपन याद दिलाणू छो।
अब सूखीगें दॄवी डावा हमारा,
जनि फाल्गुन को रस कखी हरची गेनी।

गौं की पुराणीं यादा,
बस यादू मा ही बच गेनी।

पिछले कुछ समय से एक विषय बहुत चर्चा में है, या कह सकते है कि एक शब्द समूह विशेष रूप से आम बातचीत का हिस्सा सा बन गया है।


बिल्कुल आप सही समझ रहे है, मैं आज भाई-भतीजावाद के बारे में ही बात करने जा रहा हूँ। मैं इस विषय के विवादित उदाहरणो पर ना जाकर, इसके मनौवैज्ञानिक पहलूओ पर बात करने जा रहा हूँ। प्रश्न यह है, क्या यह विचार एक सिमित समाज या समूह के लोगो में ही पाया जाता है, या हमारे समाजिक सोच का ही हिस्सा है और इसके सकारात्मक व नकारात्मक दोनो ही पहलू है।


थोड़ा सा पिछे जाकर यदि इतिहास के पन्नो को टटोलते है, तो नजर आता है कि एक राजा का उत्तराधिकारी उसका पुत्र ही हुआ करता था और मुख्य पदो पर आसीन ज्यादातर लोग कुछ परिवारो तक सिमित रहते थे। परन्तु उस दौर में यह समाजिक परम्पराओ का एक हिस्सा था, इस वजह से इसको कभी भाई-भतीजावाद की तरह नही देखा गया। फिर समाजवाद का उदय हुआ और यह प्रश्न भी उठे की, क्या गरिब का बेटा राजा नही बन सकता या फिर योग्यता के आधार पर पदो का निरर्धारण होना चाहिए।सभी के लिए समान अधिकार की बाते भी हुई और समाज ने परिवर्तन का दौर भी देखा।आज सभी के लिए सर्वोच्च पदो पर पहुँचना संभव है।

Nepotism, Article in Nepotism, Hindi Article

फिर से अपनी चर्चा को आधुनिक दौर के परिदृश्य में लेकर आते है, क्या भाई-भतीजावाद हमारा परिवार की जिम्मेदारीयो से निकला हुआ एक भाव है, या फिर हमारी जिद्द कि हमको अपने पारिवारिक सदस्यो को ही सबसे आगे देखना है।


हमारे समाज मे अमोमन यह देखा गया है कि माता-पिता सिर्फ बच्चो बङा करना, शिक्षित बनाना ही अपना कर्त्तव्य नही समझते है' बल्कि अधिकतर माता-पिता को लगता है, जब तक वो सामर्थयवान है तब तक उनको अपने बच्चो के बेहतर भविष्य के लिए कार्यरत रहना है और जब वो इस दुनिया से जाये तो बच्चो के लिए सुख-सुविधा के सभी साधन छोङकर जाये। अब यह जिम्मेदारी कब उनके मोह मे बदल जाती है,  और यह मोह कब जिद्द बन जाये कहना बहुत मुश्किल है।


व्यवसायी अपना व्यवसाय चाहे कितना ही योग्य लोगो की साहयता से ऊचाईयो पर ले जाये, परन्तु व्यवसाय का मलिकाना हक वो हमेशा अपनी आने वाली पीढीयो को ही देता है, इसमें कुछ अपवाद जरूर हो सकते है। इसी तरह डाक्टर, इन्जीनियर, अध्यापक या अन्य प्रभावशाली क्षेत्रो मे काम करने वाले लोग अपने बच्चो को उस क्षेत्र मे आगे बढने के लिए प्रेरित करते है और हर संभव साहयता करते है। यह समाज की एक समान्य सी प्रक्रिया बन गयी है, इसलिए हमको इसमे कुछ भी गलत नही लगता है।


अब कुछ क्षेत्र ऐसे भी है जहाँ आपकी पहचान का प्रभाव इस कदर होता है कि आपकी सफलता की संभावनाएँ आपकी योग्यता के साथ-साथ आपकी प्रभावशाली लोग तक पहुँच भी निर्धारित करती है। जैसे राजनीति, सिनेमा, मिडिया व अन्य सामाजिक क्षेत्रो से जुङे कार्य। जहाँ आपके परिवारो का नाम आपकी सफलता मे बहुत अहम होता है, और नये लोगो को आगे बढना इतना आसान नही होता है।


समस्या भी यह ही है, अपनो की परवाह करना या उनको सफल बनाने में मद्त करने मे कोई बुरायी नही है। परन्तु जब हम अपने प्रभाव से अधिक योग्य लोगो को पिछे करके अपने लोगो को बढावा देना शुरू कर देते है, तो समाज मे इस तरह के भेद-भाव से आक्रोश पैदा होना समान्य सी बात है। जब हम यह ठान लेते है कि अमुख पद पर हमारे अपने ही पहुँचने चाहिए, और इस जिद्द के लिए आप हजारो योग्य लोगो के सपनो को रौंदना शुरू कर देते है तो मेरी समझ में यह भाई-भतीजावाद है।


हमारे समाज में यह कहावत बहुत पुरानी है, "जैसा राजा, वैसी प्रजा"। माना की प्रजातंत्र मे राजा जैसी कोई उपाधि नही है, पर किसी भी क्षेत्र के सर्वोच्च पदो पर आसीन लोगो का चरित्र ही आज के समाज को प्रभावित करता है। अगर इन शीर्ष पदो पर व्यक्ति भाई-भतीजावाद के प्रभाव से पहुचता है तो आप समझ सकता है कि बहुत से योग्य लोग अपनी असफलता की कुंठाओ मे फसे रहेगें, और देश चलाने वाले समाज को अन्धकार की तरफ बढा रहे होंगे।


इस लेख के माध्यम से सभी पाठको से अनुरोध है, आप अपने बच्चो को योग्य जरूर बनाये, परन्तु उनको प्रतियोगिता में स्वयं को सिद्ध करने का अवसर अवश्य दे। इससे हमारे देश को योग्य युवाओ का नेतृत्व हर क्षेत्र में मिलेगा और सामाजिक सौहार्द बना रहेगा।

All content is ©copywrite of nextcenturywriter.com

 स्वयं से, स्वयंवरा बनने का यह सफर आसा न था।

मैं से, जगतजननी  बनने का यह सफर आसा ना था।


मर्यादाओ मे तो बन्धे श्रीराम थे,
पर मर्यादाओ को निभाना भी कहाँ आसान था।
पथ दिखाया है जो प्रभु ने,
चलना उस पर धर्म था।
पुष्प हो या अग्निपथ,
चलना उनको निष्काम था।

दासी जिनकी रानीयो सा जीवन करती थी बसर,
उस तीनो लोको की स्वामीनी को वन में जीवन बिताना कहाँ आसान था।
कष्ट इतने में रूकते कहाँ है,
फिर वन से हरण उनका हो गया।
राजसी वैभव जिसने था छोङा,
उसे मृग का मोह कैसे हो गया?
जो सरल थी नीर सी,
वो बाल हठ क्यो कर गयी?
स्वामीनी बैकुंठ लोक की,
कालचक्र मे क्यो फस गयी?

Hindi Poem, Indian Methodology, Poem Image

राजा राम का श्रीराम बनने का यही संयोग था।
चल पङी सीता हरण हो,
एक पथ प्रदर्शक की तरह।
स्वर्ण लंका थी जिनके लिए अति तुच्छ सी,
ऐसी पतिव्रता को रावण चला था मोहने।
फिर एक जीवन बिताया योगीनी का,
जो बना आर्दश है।

जब नही थी आस कोई,
तब भी संकल्प अडिग पर्वत सा रहा।
सहारा लेकर एक तिनके का,
दशानन का अभिमान भंजन करती रही।
फिर बनी साक्ष्य समय की,
जब रावण जर संग चल पङा।
स्थापना हुई धर्म की,
जिस धरा पर पग उनका था पङा।

आ गयी थी जानकी अब,
अयोध्या के राज्य में।
जल रहे थे दीप हर ओर,
हर्ष और उल्हास में।

त्याग और बलिदान को जैसे यह जीवन था बना,
जल्द आ गया वह दिन भी,
जब अग्निपथ पर चलना पङा।
मर्यादा पुरूषोत्तम तो बन गये श्रीराम थे,
पर मर्यादाओ की आग मे चल रहा कोई और था।
मैं से, जगतजननी बनने का यह सफर,
सच में कहाँ आसान था।