क्या होता जो ये जिंदगी का आखिरी दिन होता,
ये आने वाला कल बस बातों में रह जाता,
जो आदत पड़ी है मुझको छोड़ने की कल पर,
क्या आज भी इस दिन को कल पर छोड़ जाता।

बिन वक्त गवाये मैं कुछ काम में जुट जाता,
यादों में रहते है जो दोस्त मेरे, उनसे मैं कुछ बातें कर लेता।
झट से करता एक मैसज टाईप, और थैंक्यू मैं सबसे कहता।
याद करता उन सबको, जिनको किया परेशान कभी,
उन सबको दिल से सॉरी मैं कहता।

सोने को गोद तलाशता मैं माँ की,
लड़-झगड़ने को भाई-बहिन को बुला लेता,
बच्चों को सिर्फ प्यार ही देता,
और जीवन-साथी को कहता,
बैठो दो घड़ी तुमको निहार लूँ,
बाते बस उस पल दिल की होती,
रिश्ते पर उम्र का पहरा ना होता।

मैं हर वो कोशिश करता, 
जो मैंने छोड़ दी था कल पर,
मैं हर वो काम मुकम्मल करता,
जिसका मुझमें हुनर होता।

शायद मैं भूल जाता मजहब को,
दिल में कोई बैर न होता,
सब में मुझको अच्छा ही दिखता,
सब कुछ मुझको मुमकिन लगता।

शायद हम सब कुछ ऐसा ही करते,
जो ये हमारा आखिरी दिन होता,
ये दिन गुजरेगा और एक नया वर्ष शुरू हो जायेगा,
कब तक कल पर छोड़े जीवन को,
अब बस आज को ही बेहतर जीया जायेगा। 
                                           "" Very Happy New Year to All of You ""


Live everyday like its your last, follow your dreams, forget your problems, never hold back, you never know what's around the corner.

कदगी तेज भागी मी यन ऊँचा-नीचा बाटों बै,
फाल मारी मिल हमारा ऊँचा बाड़ा बे,
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

अब यन न देख तू म्यारा फाटया सुलार ते,
हक-बक मा फसी छो मी कुँजी का बीच मा,
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

यन नजर से ना देख मैते,
माना आज नी दिखणू छो मी मनखी जन,
रात ज्यादा लगेली छे मीलयो मिन,
और भीड़गी छो 2-4 नौनो संग।
पर ते मिलड़ आयूँ ची मी,ये बन्द नीली आँखी मा।

मी नी छो तेरो बाबू को हल्या,
फिर किले बिठायूँ मैंते ये डीप धार मा।
संग बैठ, कुछ गप लड़ो ये बीचली धार मा।
ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...

यती उधभरी भी कभी न छो मी,
पर न जाड़ी ग्रहो की क्या कुचाल चली,
सिदा बाटा औणू छौ मी, न जाड़ी कनके ढसाक लगी।

माना की कुछ दोष यन धूपी चश्मों को भी छो,
जूँ रुमकी बगत भी लगयाँ छा,
पर पिछली शनिवार किले बोली तेन, य्ँ में पा जचणा छा।
अब ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी, ये टूटया चश्मा ते खिशा मा लगेके।

हाकी बार औंण से पैली मिल दिन दिखोण,
आज त मी फँसी रम की बास मा, हाकी बार मिल वोडका लगोंण।
जरा ता भाव दे छोरी, आयूँची ये दूर धार मा,
जु नी होंण छो मी दगड़ी, सब कुछ ह्वेगी ये बार मा।

ते मिलड़ का बाना आयूँ छो मी घुन्डा छिले के...
छवाड़ के ये नखरा अपड़ा जरा प्रीत दिखे दे।

मुझे अलग-अलग राजनीतिक विचार धाराओ से मुक्त भारत नहीं चाहिए,
मुझे हर अच्छी राजनीतिक पार्टी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे दो वक्त की रोटी और पक्का घर चाहिए।

मुझे मैक इन इंडिया और एफ.डी.आई. भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे सरकारी स्कूल में अच्छी शिक्षा चाहिए। 

मुझे साइनिंग इंडिया और डिजिटल इंडिया भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे शिक्षा की काला बाजारी  बंध चाहिए।

मुझे मंदिर और मस्जिद दोनों चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे अपने बच्चों का बेहतर भविष्य चाहिए।

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मुझे अपनी बिटिया मिस. वर्ड और साइन्सटिस्ट भी चाहिए,
पर इन सब के संग मुझे हर एक लड़की की सुरक्षा चाहिए।

मुझे एम्स और आई.आई.टी. भी चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे जिला अस्पताल में डॉक्टर, दवा और टेस्ट चाहिए।

मुझे स्वच्छ भारत और बुलेट ट्रेन भी चाहिए,
पर इन संग मुझे गाँवों तक रोडवेज बस भी चाहिए।

मुझे कश्मीर से लेकर डोकलाम चाहिए,
पर इन सब से पहले मुझे खाली पड़े गाँवों में 2-4 लोग चाहिए।

ये सब तो शायद मुझे चाहिए, आप भी सोच लो आपको पहले क्या चाहिए।
मुझे तो मेरा परिवार खुश चाहिए, ना कोई मजहब की बंदिश ना कोई गुटबाजी चाहिए। 

वो दिन कितने हसीन थे,
जब दिन खेलने को छोटे होते थे,
और रातें पढ़ने  को लम्बी लगती।

वो दिन सच्च में बहुत हसीन थे,
जब कलॉस लम्बी लगती थी,
और इंटरवेल छोटे पड़ जाते थे।

हम कितने खुश थे तब,
जब पन्नी में बंधा टिफिन होता,
और बैग अपना फटा होता। 

हम सच्च में कभी बहुत खुश थे,
टेंन्शन का तो पता ना था,
पर होमवर्क पहाड़ सा लगता था।

वो हँसी कितनी सच्ची थी,
दोस्तो से ही लड़ते थे,
फिर संग ही ठहाके लगते थे।

वो भी क्या मस्ती होती थी,
बारिश में बिन छाते के जाते थे,
फिर देख भीगी किताबें अपनी, खुद ही खुश होते थे।
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बस एक ही तो था, जिससे हम सब डरते थे,
पर वो सर कलॉस के बाद सबसे अच्छे लगते थे,
संग उनके मस्ति होती थी, और डंडे भी खाया करते थे।

एक दोस्त सयाना होता था,
जिसकी हर बाते सच्ची लगती थी,
जब भी कोई मसला होता,
ज्ञान वही तो देता था।

सच्च में वो दिन कितने अच्छे थे,
कलॉस में वो भी तो संग में पढ़ती थी,
बातों में वो मेरी-तेरी होती थी,
पर संग सहज ही रहते थे।

वो दिन मुझको याद आते है,
जब हमको जल्दी अठरा का होना था,
हमको भी कॉलेज जाना था.

सच्च में वो दिन कितने अच्छे थे,
जिसको हम बचपन कहते है, 
और अब इसकी यादों में खोये रहते है।

अगर हम जंगल में होते और जंगली होते तो कुछ और बात थी,
पर हम शहर में जंगली जानवर से निकले, तो ये क्या बात है?
अगर घर से बाहर निकली लड़की दुनिया की आखिरी लड़की होती तो कुछ और बात थी,
पर जो हम गिद्ध की नजरों से हर राह चलती लड़की को देखे, तो ये क्या बात है?

अगर धरती की कोर में हो और सुलगते हुए लावा हो तो कुछ और बात है,
पर जो हम देख अपने दोस्तों की खुशी बन फटे ज्वालामुखी, तो ये क्या बात है?
जो दुनिया की हर खुशी और गम का मर्ज नशा होता तो कुछ और बात थी, 
पर खुशहाल घर को तबाह और गम में बरबाद होने को नशा किया, तो ये क्या बात है?
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गरीब से काम लेकर उसको काबिल जिंदगी जीने के बनाया तो कुछ और बात थी, 
पर जो हमने गरीबो का निवाले छिन के महल बनाया, तो ये क्या बात है?
जिनसे सीखे हो चलना और जिंदगी की राहो में आगे बढना, उनको बुढ़ापे में प्यार दिया तो कुछ और बात है,
पर हमने उनके अहसानों को भूल कर उनको दर-ब-दर भटकाया, तो ये क्या बात है?
शानौ-शौकत कमायी संग परिवार के तो कुछ और बात है,
पर जो घर को वीराना बना कर पैसा कमाया, तो ये क्या बात है? 

कुछ और बात थी ... या....ये क्या बात है?
इन दोनों के बीच छिपी खुशियों की सौगात है,
जो समझे इसे तो कुछ और बात है, 
जो नासमझ है, तो क्या बात है?

बहुत दूर से चाँदी के सिक्कों के खनकने की आवाज आ रही थी।
शाम मदहोश थी और अपने आगोश में डूबती जा रही थी।
राह में एक हंसो का जोड़ा प्रेमरस में गोते खा रहा था।

नाचती डोलती वर्षा की फुहारे प्रकृति का स्पर्श करते हुए धरा  पर आ रही थी।
मेघ पहली बार तो इस तरह तो नहीं बरसे थे,
फिर ये युगल क्यों इतना प्यासा नजर आ रहा था।
यूँ तो बारिश की बूंदें सबको भीगो रही थी,
पर इनके लिए खुशियों के हसीन पल संजो रही थी।
सब परेशा अपने घरोन्दो को जाने को थे,
पर ये तो मदमस्त अपने ख्वाबों में थे।

हम ये नजारा अपने आशियाने से देख भर खुश थे,
तब ये उस पल को जिंदा दिली से जी रहे थे।
बारिश तेज हुई और भावनाओं का सैलाब ले आयी,
न रोक सके ये खुद को, और बढ चले प्रेम पथ पर आगे।
प्रकृति का वो दृश्य शान्त था, और झुक कर लताएं मुस्करा रही थी।
तब एक मस्त पवन का झौंका आया प्रेम पराग को फैलाने,
बहुत दूर-दूर तक ये बात गयी है, चर्चा होगी हर घर में।
जब ये प्रेम पसरेगा हर घर में, तभी तो दिल से बैर मिटेगा। 

Thoughts born in mind and get an emotional touch from heart. It makes a person great or worst. A human defined by their thoughts, we can say that thoughts is a mirror image of a person. If your thought process is not clear then we can easily find that person is confused and such person can not rule the world.

All great people are great thinker too, their word always have a magic to catch attention of crowd and they can inspire to a versatile mob. 

Our thoughts can make someone happy and make them cry too, it is a cause of peace or war in the world. Thoughts of Mahatma Gandhi became a way of our freedom from British at the same time thoughts of Hitler became a cause of second world war, which we can say a cause of distortion for mass. 

That's why someone said, "World are mighty then the Sword". 

Think once before eat but think twice before speak. 

""Sometime I think, Sun comes from clouds to say good morning to me.
Birds Sing a song at evening when I go to bed.
Wind touch me and say wake up baddy, its time to run faster then me.
Rose says make someone happy by saying I Love You and I Do Care About You.""

""Mountain which is standing in front of me says by banding his head, Sir it's time to climb on me.
Animal are saying to me please save the Nature and Enjoy with us.
River is touching my feet and saying keep going on whatever is the way.
Moon is saying see everything but never lost your shine and kindness.""

""Stars are saying no matter you are staying in difficult situation, but keep smile on your face.
and parents are saying whatever will be the condition, you are our hero and we are always with you.""

बहुत मुदतों कै बाद रोशन हुआ है ये आँगन हमारा,
                बहुत मुदतों कै बाद रोशन हुआ है ये आँगन हमारा,
आज बादलो से कह दो कि न ओढ़नी उढ़ाये, मुझे देखने दो मेरे प्यार को।                तरसा हुँ हर पल इस एक पल कै लिए मै, ये पल जो मिला है मुझे झूमने दो,
न ये सावन कि ऋतु है न ये मौसम बसंती, न ये सावन कि ऋतु है न ये मौसम बसंती,
               पर मेरी तो मानो ईद आ गयी है। 
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लोग कहते है अक्सर रात काली मै किसको कभी क्या मिला है,
                पर मै प्यासा था जिसका वो मुझको इसी मै मिला है,
मै चाहता हू उसको, ये उसे क्या पता है, वो खूबसूरत है इतना उसे हर दूसरा चाहता है।
                 जो मोका मिले तो दिखला दूंगा उसको, जो मोका मिले तो दिखला दूँगा उसको,
कि प्यार कितना हमे हे उस से, फिर सोचता हूँ क्या मेरी म्होब्ब्त मोका परसत है?
                मै प्यार करता हु यूंही करता रहूँगा, एहसास उसको भी होकर रहेगा
बहुत मुदतों कै बाद रोशन हुआ है ये आँगन हमारा, आज जी भर कै उसका दीदार कर लू।
                    आज जी भर कै उसका दीदार कर लू॥ 

जिन्दगी मेरी रंग-ए-महफिल है, शुक्रिया इस में समा जलाने के लिए।
बहुत बेजान सी ये शाम थी, शुक्रिया इसमें रौनक लाने के लिए। 
बहुत दूर तक देखा तो तनहाई थी, तुम संग बहार ले आयी हो। 
तेरी कानों की बाली पर आ रुकी है सभी की नजर, घुंघरू की छनक हर दिल में रवानी लायी है।  
आज वो भी चरचे हमारे करते हे, जो कल तक दूरी बनाये बैठे थे।
तेरे चेहरे की चमक के सामने लगता हर कोई परछायी है, तेरे आने से मेरी मुस्कान  लोट आयी है।
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ऊफ ये तेरा यौवन, ये जवानी की छटा, मार ही डालेगी उसको जिसने नजर मिलायी है।
लोग कहते है शायराना आज मेरा अन्दाज हे, पर किसी को खबर नहीं ये अलफाज तुम से ही तो  चुराये है।
तुझको छू के गुजरने वाली ये सर्द हवा, मेरे सीने में चिंगारी मुहब्बत की जगा देती है। 
लगता हे, आज दिन है मुहब्बत में शहादत पाने का, इसलिए बिन कुछ बोले ही तू इतने करीब चली आयी है।

ये तारो से सज़ा आसमां और चाँद खुद धरती पर उतर आया है। 
न तो ये दिन ईद का, न आज तीज आयी है, न जाने फिर क्यों दिंलो के दरमियान इंतजार की घड़ी आयी है।
शुक्रिया इस दिल में दस्तक देने के लिए, तेरे आने से ही इस महफिल जान आयी है। 

जिन्दगी मेरी रंग-ए-महफिल है, शुक्रिया इस में समा जलाने के लिए।
बहुत बेजान सी ये शाम थी, शुक्रिया इसमें रौनक लाने के लिए।